नमस्कार
आतंवादियों का काम लोगों को मारना और समाज में अशांति पैदा करना होता है। ये जो भी लोग होते है वो अमानवीय होते है , इनमें मानवता या इंसानियत नाम की कोई चीज नही होती है। ये जब किसी जगह गोलियाँ चलाते है तो उसमें मरने वालों में सभी धर्म और मजहब के लोग होते है , ये जब किसी घर , होटेल या किसी जगह को बम से उड़ाते है तो उसमें चीथड़े - चीथड़े उड़ने वाला इंसान किसी भी धर्म या मजहब का हो सकता है। अन्य किसी भी देशों में आतंक को धर्म से जोड़ते नही देखा गया है लेकिन भारत में कुछ अकर्मण्य नेताओं और किसी विशेष संगठन के लोगों ने इन कुछ वर्षो में आतंकवाद को धर्म से जोड़ना शुरू करके इंसानी समाज में एक जहर घोलने जैसा काम किया है।
आतंवादियों का काम लोगों को मारना और समाज में अशांति पैदा करना होता है। ये जो भी लोग होते है वो अमानवीय होते है , इनमें मानवता या इंसानियत नाम की कोई चीज नही होती है। ये जब किसी जगह गोलियाँ चलाते है तो उसमें मरने वालों में सभी धर्म और मजहब के लोग होते है , ये जब किसी घर , होटेल या किसी जगह को बम से उड़ाते है तो उसमें चीथड़े - चीथड़े उड़ने वाला इंसान किसी भी धर्म या मजहब का हो सकता है। अन्य किसी भी देशों में आतंक को धर्म से जोड़ते नही देखा गया है लेकिन भारत में कुछ अकर्मण्य नेताओं और किसी विशेष संगठन के लोगों ने इन कुछ वर्षो में आतंकवाद को धर्म से जोड़ना शुरू करके इंसानी समाज में एक जहर घोलने जैसा काम किया है।
चुनाव के वक्त या अन्य समय में भी भारत में धर्म को आतंकवाद से जोड़ना यहाँ के नेताओं के लिये आम बात बन चुका है।देश के विभिन्न हिस्सों में हिंसक घटनाओं में चरमपंथी मुस्लिम संगठनो के हाथ होने को भाजपा और आरएसएस ने जबरदस्त नकारात्मकता के साथ प्रचार - प्रसार किया और इस जहरयुक्त आग को फूँक मारने का काम किया। भाजपा को ऐसा करने से राजनीतिक लाभ मिलता है , लेकिन यहाँ सोचने वाली बात ये है की क्या राजनीति लाभ के लिये समाज को आग में झोंकना कहाँ तक उचित है।
मालेगांव में जो बमबारी हुआ था उसमें हिन्दू संगठन और एक साध्वी का नाम आया था लेकिन क्या इसलिए हम हिंदुओं को आतंकवादी कह देंगे ? नही ना क्योंकि आतंकवाद का कोई धर्म नही होता है। लेकिन यहाँ प्रश्न ये उठता है की अगर कुछ चरमपंथियों के करतूतों के कारण अगर आप किसी समुदाय को आतंकवादी कह देंगे और उन्हें प्रताड़ित करेंगे तो आग तो सुलगेगा ही और उधर से भी ये आरोप मढ़ा जायेगा। ऐसा ही अब होना शुरू हो चुका है भाजपा और कुछ हिन्दुवादी संगठन ने जो जहरयुक्त आग जलाने का काम किया था , उसमें अब दोनों तरफ से लकड़ी डालने का काम शुरू हुआ है। लेकिन ये आग किसी एक वर्ग -समुदाय को नही बल्कि सम्पूर्ण मानव समाज को जलाने का काम करेगा।
हम एक ऐसे देश के नागरिक है जहाँ गंगा -जमुनी तहजीब को माना जाता है , जहाँ के लोग विभिन्न धर्मो के होते हुये भी एक साथ रहते आये है। जहाँ राम और रहीम दोनों ही एक साथ खाते -पीते है। जहाँ कबीर और कालिदास दोनों को पढ़ा जाता है। जहाँ मंदिर और मस्जिद में साथ साथ प्रार्थाना होता है। तो क्या इस देश में स्वार्थी नेताओं और अलगाववादी संगठन इस आग को फैला देगी और हम भारतवासी इसे फैलने देंगे ?
हाल ही में जो कमल हासन का बयान है की स्वतंत्र भारत का पहला आतंकवादी एक हिन्दू था वो ऐसे जगह पर कहा गया है जहाँ मुस्लिम समुदाय के लोगों की संख्या अधिक है। और जहाँ हिन्दू समुदाय के लोग अधिक होते है वहाँ यही नेता मुस्लिम आतंकवाद की बातें करते है और इतना बात ये समझने के लिये काफी है की आतंकवाद को धर्म से जोड़ना इनके लिये फायदेमंद है हमारे लिये नही , आतंकवाद को तिलक और तुर्की टोपी से जोड़ने के प्रयास से भारत को खतरनाक बारूदी सुरंग में धकेलने की गंध आ रही है, जिस पर तुरंत लगाम लगाए जाने की जरूरत है।
धन्यवाद
आतंकवाद का कोई धर्म या मजहब नही होता है ।
Reviewed by मेरी डायरी : हिमांशु
on
Wednesday, May 15, 2019
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